कांग्रेस की अग्निपरीक्षा शुरू होती है अब

कांग्रेस की अग्निपरीक्षा शुरू होती है अब
रजत कुमार गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार ,   Dec 16, 2018

पांच में से तीन राज्यों में सरकार बनाने में सफल कांग्रेस अंदर- बाहर से बहुत खुश है. यह कांग्रेस के लिए प्रसन्न होने लायक स्थिति भी है, क्योंकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे पंद्रह साल के बाद सरकार बनाने का मौका मिल रहा है. साथ ही इन राज्यों के चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि अब बीजेपी के विजय रथ की राह में रोड़ा अटकता जा रहा है. जबकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इसका अहसास नहीं रहा होगा कि राहुल गांधी की कांग्रेस एक झटके में बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती पेश कर सकेगी.  

विधानसभा चुनाव के नतीजों ने लोकसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी का राजनीतिक कद भी बड़ा कर दिया है. विपक्ष के प्रस्तावित महागठबंधन में उन्हें बड़ा चेहरा के तौर पर देखा जाने लगा है. आगे कुछ ही महीने बाद लोकसभा चुनाव होंगे. और बीजपी के रथ का नेतृत्व खुद नरेंद्र मोदी कर रहे हैं इससे कांग्रेस को कोई सुविधा अथवा सहुलियत मिलने जैसी स्थिति नहीं है. 

अलबत्ता अगर कांग्रेस ने सरकार बनाने के बाद खुद की घोषणाओं को अमलीजाम पहनाने में कोताही की, तो तय है कि जनता का भरोसा फिर टूटने की वजह से पार्टी को पूरे देश में खासकर हिंदी पट्टी में इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है. दरअसल चुनावी प्रचार में कांग्रेस ने जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने की दिशा में सोच और सकारात्मक कदम कैसे उठाए जाएंगे, इस पर आगे बहुत कुछ निर्भर कर रहा है. 

हालांकि मध्यप्रदेश और राजस्थान में बसपा और सपा के समर्थन को लोकसभा के लिए अंतिम मुहर नहीं माना जा सकता है. दूसरी तरफ देश में सबसे अधिक सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश में निश्चित तौर पर बसपा और सपा का प्रभाव कांग्रेस से अधिक है. तब बीजेपी विरोधी मोर्चा का स्वरूप कैसे तय होगा और इसमें कौन से दल अपना हित, स्वार्थ त्यागने पर तैयार होंगे, यह बड़ा सवाल सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस को ही हल करना है. 

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कांग्रेस को इस स्थिति में एक लाभ तो तेलुगु देशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू की सक्रियता और राहुल गांधी के साथ नजदीकी बढ़ने से मिला है. चंद्र बाबू नायडू ने सुस्त पड़े अभियान को गति देते हुए अनेक गैर बीजेपी दलों के प्रमुखों से अपनी पहल पर मुलाकात कर रिश्तों पर जमी धूल को हटाने का काम किया है. नायडू ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भेंट कर बीजेपी विरोधी मोर्चा को सक्रिय करने की कोशिशें भी तेज की है. 

इसी क्रम में शरद पवार सरीखे नेता भी नये सिरे से बीजीपे की खिलाफ हो रही मोर्चाबंदी में सक्रिय भूमिका निभाने में आगे आते नजर आ रहे हैं. जनता दल यूनाईटेड से शरद यादव का रिश्ता खत्म होने के बाद वे भी विपक्ष के प्रस्तावित गठबंधन की कवायद में जुटे हैं. हाल ही में शरद यादव का रांची  आकर लालू प्रसाद से मुलाकात को इस कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है. 

इन तमाम तैयारियों के बीच असली सवाल सीटों के बंटवारे का है. क्षेत्रीय दलों की पकड़ वाले इलाकों में कंग्रेस इनसे सीटं पर तालमेल की गुत्थियां कैसे सुलझायेगी, इस पर सबकी नजर लगी है. यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अगर अधिकांश सीटों पर क्षेत्रीय दल अपने दावे से पीछे नहीं हटे और सीटें छोड़ भी दी जाए, तो कांग्रेस को लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने लायक संख्या बल कैसे हासिल होगा. इन दोनों परस्पर विरोधी सवालों के बीच संतुलन कायम करना दरअसल कांग्रेस की जिम्मेदारी होगी.

जाहिर है तीन राज्यों की सत्ता पर काबिज होने के बाद हिंदी पट्टी राज्यों में बीजेपी के खिलाफ हवा बनाने और जनता का मिजाज वक्त के साथ भांपकर रणनीति तय करने की चुनौतियां भी कांग्रेस के सामने है. इन मामलों में राहुल गांधी का राजनीतिक प्रबंधन कौशल भी परखा जाना बाकी है. कांग्रेस के सामने एक और डर यह है कि नरेंद्र मोदी विरोधी महत्वाकांक्षी राजनेता कई मौके पर सफलता और समझदारी की गारंटी के साथ सियासत करने तथा चुनावी बिसात बिछाने में नाकाम होते रहे हैं.   

चुनौतियां सरकार की

काफी कश्मकश, मान- मनौव्वल और मंथन के बाद कांग्रेस ने मध्यप्रदेश और राजस्थान के लिए मुख्यमंत्री के नाम तय कर लिया है. छत्तीसगढ़ के लिए प्रयास जारी है. जहां तक तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार चलाने की बात है, तो मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी अपना किला सुरक्षित रखने में सफल कमलनाथ मध्यप्रदेश की चुनौतियों को संभाल सकते हैं. कमलनाथ के पास राजनीतिक अनुभव लंबा है, इसका लाभ वे उठा सकते हैं. इसी तरह अशोक गहलोत भी अनुभवी नेता के तौर पर राजस्थान की गाड़ी खींच सकते हैं. गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जबकि छह बार वे केंद्र में मंत्री रहे हैं. 

आपसी खींचतान और विवादों को दरकिनार कर चुनावों का सामना करती रही कांग्रेस ने राजस्थान में सचिन पायलट को डिप्टी सीएम बनाकर पार्टी में बैलेंस बनाने की कोशिश की है. कांग्रेस ने आंतरिक कलह बढ़ने की गुंजाइश को रोकने की कोशिश की है. अब युवा नेता के तौर पर पायलट खुद को बड़े फलक पर निखार सकते हैं. 

लेकिन असली सवाल इन राज्यों में जनता से किये गये वादों को पूरा करने का है। इस मोर्चे पर विफलता कांग्रेस की गाड़ी को फिर से पुरानी स्थिति में धकेल सकती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जिस तरह से लहर चली उससे उसकी सरकार की जनता के प्रति जिम्मेवारी कहीं ज्यादा बढ़ जाती है. तीनों राज्यों में कांग्रेस ने आम जनता , किसानों के सामने ढेर सारे वादे किए हैं और बीजेपी सरकार की नाकामियां भी खूब गिनाई है. इसलिए उन वादों पर आगे बढ़कर काम करना कांग्रेस की बड़ी चुनौती होगी. चूंकि कुछ ही महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं. 

( लेखक राष्ट्रीय खबर के संपादक हैं) 

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