'आंखों में झांक कर देखिए, बेबसी में जीते हैं और गम पीते हैं'

'आंखों में झांक कर देखिए, बेबसी में जीते हैं और गम पीते हैं'
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पीबी ब्यूरो ,   Jul 06, 2019

पंचायत सचिवालय का निर्माण 11 सालों से अधूरा पड़ा है. गांवों में सड़कें नहीं और महीने में चार दिन बिजली मिलना मुश्किल. नदी का पानी छान कर पीयें. बच्चों के तन पर कपड़े न हों, बीमार पड़ने पर दवा और डाक्टर नहीं मिले. हर काम के लिए 20-25 किलोमीटर जाना पड़े. मजदूरी बकाया रहे और खेत सूखे पड़े हों. रोजगार के लिए हाथ खाली रहे. हाड़तोड़ मेहनत- मशक्कत से जिंदगी चलती हो, तो चेहरे पर खुशियां कहां से दिखेगी. सबकी आंखों में झांक कर देखिए. और चेहरे पढ़िए. गुस्सा और गम तो है ही. लेकिन लोग उसे पी जाते हैं. 

दिलबर लुगून इतना कहने के बाद बैठक और चर्चा में शामिल हो जाते हैं. उनसे पूछा था कि आदिवासियों के बीच से हताशा- निराशा के स्वर क्यों सुनाई पड़ रहे हैं. ये तस्वीरें झारखंड में चाईबासा जिले के बंदगांव प्रखंड स्थित जलासार पंचायत के गांवों की है.

हाल ही में इस पंचायत के 22 गावों और 88 टोले से जुड़े प्रमुख लोगों ने पोडेंगेर में बैठक की है. साथ ही इस बात की मुनादी भी कि अपनी आवाज नए सिरे से शासन- प्रशासन तक पहुंचाई जाए, ताकि कहीं से कोई रास्ता निकल आए. बैठक में शामिल  बुजुर्गों ने दो टूक कहा कि ग्राम सभा की ताकत को मजबूत करना होगा. 

पिछले दिनों में इसी इलाके में सिंदरीबेड़ा और चंपाबाहा में पत्थलगड़ी समर्थक सक्रिय हुए थे. गांवों के लोगो के राशन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार कार्ड जमा कराने की कोशिशें की गई. बहुत लोगों ने जमा भी किया.

पत्थलगड़ी समर्थकों के सक्रिय होने की खबरें जिला मुख्यालय से लेकर राजधानी रांची तक पहुंची. इसके बाद सरकारी तंत्र में मामूली  हलचल हुई. पुलिस और सरकारी मुलाजिमों की उन इलाकों में आवाजाही बढ़ी. लेकिन जलासार पंचायत के लोग पत्थलगड़ी समर्थकों का साथ नहीं देना चाहते. गांवों के लोग बस इतना चाहते हैं कि अबुआ दिसुम अबुआ राज अगर नहीं देते, तो कम से कम कठिन हालात बदल जाएं.  

Publicbol (11 सालों में अधूरा पड़ा है पंचायत सचिवालय) 

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यूं ही नहीं सक्रिय होते

जालासार पंचायत के एक युवा बताते हैं, ''मजबूरियां जब आड़े आती हैं, मुश्किलों में जब गांव के लोग होते हैं. सरकारी योजना और जन कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ नहीं पहुंचता, तो नक्सली या पत्थलगड़ी समर्थक, भोले और बेबस आदिवासियों को अपने पक्ष में करने में सफल होते हैं''. फिर जब बात बिगड़ती है, तो सरकारी मुलाजिम पहले दमन करते हैं फिर मरहम लगाने की कोशिश. यकीन मानिए, इन्हीं सरकारी विफलताओं के बीच विवादित पत्थलगड़ी समर्थक बंदगांव के सुदूरवर्ती गांवों में लोगों से राशन कार्ड, वोटर कार्ड और आधार कार्ड जमा करवा रहे हैं.''

रांची- चाईबासा मुख्य मार्ग स्थित बंदगाव प्रखंड से जालासार की दूरी लगभग पंद्रह किलोमीटर है. गांव पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है.

उप मुखिया बासू डांहगा बताते हैं, ''11 सालों से पंचायत सचिवालय का निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है. इसके बारे में प्रखंड के अधिकारियों का कई बार ध्यान दिलाया गया. पंचायत सचिवालय बन जाता, तो प्रज्ञा केंद्र, बैंक मित्र, स्वास्थ्य सहिया, एक छत के नीचे बैठ सकते थे. मुखिया, उपमुखिया और वार्ड सदस्यों के लिए भी सुविधा होती. पेंशन और अन्य काम के लिए लोगों को 20-25 किलोमीटर जाना होता है. गांव के लोग कई मौके पर मुखिया और उपमुखिया से पूछते हैं कि अगर मुरहू और बंदगाव प्रखंड मुख्यालय जाकर ही जरूरत के काम निपटाए जाएं, तो पंचायत का क्या काम रह जाता है. तब हमें जवाब देते नहीं बनता. पत्थलगड़ी समर्थक इस पंचायत में सक्रिय नहीं हो सकें, इसी मकसद से ये सामूहिक बैठक बुलाई गई है''. 

विकास का सच 

जालासार पंचायत के गांवों के अधिकतर लोगों को आयुष्मान योजना की जानकारी नहीं हैं. प्रधानमंत्री आवास और स्वच्छ भारत अभियान का समुचित लाभ भी जरूरतमंदों को नहीं मिला है.

कई गांवों में शौचालय बने, तो लोग उसका इस्तेमाल नहीं करते. पावल डांहगा बताते हैं कि पानी रहे तब तो लोग शौचालय का इस्तेमाल करें. पावल बताते हैं कि इस इलाके में बिजली पोल गाड़ने के लिए ठेकेदारों ने गांव के लोगों से काम कराया, लेकिन बहुत लोगों को मजदूरी नहीं मिली. अब वे ठेकेदार को कहां खोजें और किससे गिला- शिकवा करें. गांव या पंचायत में साहब आते नहीं.

जालासार की गलियों में नंगे बदन कुछ आदिवासी बच्चे दिखे. बुजुर्ग महिला रतिया बताती हैं कि बैठक की वजह से गांव के अधिकतर लोग पोडेंगेर गए हैं. खेती- बारी के सवाल पर वे गंवई लहजे में कहती हैं- पानी और पैसा रहेगा तब तो.  दो बच्चियां जमीन में धंसे जा रहे चापाकल से एक डेगची पानी निकालने की जद्दोजहद कर रही हैं. बच्चों के तन पर कपड़े नहीं हैं. 

Publicbol (पंचायत के 22 गावों के लोगों ने बैठक कर आंदोलन की मुनादी की)

अब्राहम डांग कहते हैं कि प्रखंड के साहबों को गांवों में बुला लीजिए लोग पहचानेंगे नहीं. दरअसल कोई कभी दौरे पर आए और गांव वालों से संवाद करे, तब तो.

बिजली के पोल गाड़े गए, तार जोड़े गए, लेकिन लोगों को नसीब नहीं होती. हमें पता है कि सरकारी कागज में जरूर लिखा गया होगा कि जालसार पंचायत के गांवों में बिजली पहुंचा दी गई है. इस पंचायत के अधिकतर गांवों में उबड़ खाबड़ सड़कें हैं. बरसात के दिनों में मुश्किलें बढ़ जाती है.

अब्राहम की शिकायत जनप्रतिनिधियों से भी है. वे इस बात पर जोर देते हैं, 'जंगलों- पहाड़ों से घिरे गांवों में लोग पैदा ही लेते हैं संघर्ष करने के लिए. साथ ही सवाल करते हैं कि इसी सूरत के लिए झारखंड नहीं बना था'. 

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ठेकेदार-अफसर गंठजोड़

जलासार पंचायत सचिवालय ग्यारह साल बाद भी बनकर तैयार नहीं हुआ. कई ग्रामीणों की शिकायतें थी कि भवन निर्माण के काम में लगे मजदूरों की मेहनत की कमाई भी ठेकेदार ने हड़प लिया. पूरे पंचायत में बिजली के खंभे गाड़कर तार खींचे गए, लेकिन खंभे गाड़ने वाले मजदूरों की मजदूरी बाकी है. मनरेगा के तहत कुंआ खोदने वाले मजदूरों को भी भूगतान नहीं किया गया है. एक साल पहले बंदगांव से कातीदिरी और कातीदिरी से पोड़ोंगेर तक बनी सड़क अब टूट चुकी है. टूटी सड़क घटिया निर्माण की बानगी भर है. 

हालांकि यहां अब एक नई और चौड़ी सड़क बनाने का काम चल रहा है. अन्य सरकारी योजनाओं का कमोबेश यही हाल है. सरकारी योजनाओं पर गौर करने से एक बात साफ तौर पर रेखांकित होती रही कि अफसर-ठेकेदार-इंजीनियर गंठजोड़ ने आदिवासी इलाकों में जैसे- तैसे काम करके अपने चेहरे जरूर लाल किए होंगे.   

ग्रामीणों की मांग

मुखिया मुखिया सुचिता डाहंगा की अगुवाई में हुई इस बैठक में ग्रामीणों ने पोड़ोंगेर बाजार से गुदड़ी तक 33 किमी लंबी सड़क, जलासार से फटका और पोड़ोंगेर से सोगा तक सड़क निर्माण की मांग रखी.

साथ ही जलासार में एक उच्च विद्यालय,  ग्रामीण बैंक, अधूरे पड़े पंचायत सचिवालय का निर्माण  पूरा कराकर उसे क्रियाशील करने, गांव में नियमित रूप से बिजली की आपूर्ति करने की मांग की गई. 

सरकार तक पहुंची

राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा के मुताबिक जलासार पंचायत के गांवों की लोगों की समस्या से वाकिफ होने के बाद जिले के उपायुक्त को ग्रामीणों का आवेदन दिया गया है. पंचायत सचिवालय क्यों नहीं बना, यह गंभीर मामला है. इसे खुद वे देंखेंगे. कई सड़कों की स्वीकृति दी गई है. और काम भी शुरू हुआ है. ग्रामीणों ने बैठक कर समस्याओं पर चर्चा की है. इससे संवाद बढ़ेगा. 


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