चाईबासाः 'मोदी की लहरों' से टकराती गीता ने गिलुआ को कैसे दी मात?

चाईबासाः 'मोदी की लहरों' से टकराती गीता ने गिलुआ को कैसे दी मात?
Publicbol ( नतीजे आने के बाद गीता कोड़ा अपनी बेटी के साथ)
चित्रांश ,   May 24, 2019

मधु कोड़ा और उनकी पत्नी गीता कोड़ा की राजनीति क्या है और कोल्हान में हैसियत कितनी है, लोकसभा चुनाव के परिणाम के साथ ही सामने दिखता है. गीता कोड़ा कांग्रेस के लिए तुरूप का पत्ता साबित हुई हैं. 'मोदी की लहरों' से टकराती हुई गीता कोड़ा ने चाईबासा की सीट बीजेपी से छीन ली है.

गीता कोड़ा की जीत की अहमयित इसलिए भी है कि उन्होंने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को हराया है. साथ ही 2014 में गिलुआ से हार का बदला लिया है. गीता कोड़ा ने लक्ष्मण गिलुआ को 72 हजार 155 वोटों से हराया है. 

दरअसल हिन्दी पट्टी राज्यों में कांग्रेस के बेहद खराब प्रदर्शन के बीच गीता कोड़ा झारखंड में पार्टी की लाज भी बचा सकी हैं. झारखंड में कांग्रेस ने गठबंधन के तहत सात सीटों पर चुनाव लड़ा था. जिसमें चाईबासा से गीता कोड़ा ही जीत सकीं. उधर बिहार में भी कांग्रेस को एक सीट मिली है. 

जीत के बाद पहली प्रतिक्रिया में गीता कोड़ा ने कहा है, ''कार्यकर्ताओं के दृढ़ निश्चय और जनता के अपार समर्थन से यह जीत मिली है. सभी साथी दलों ने भी मेहनत की. इस चुनाव को हम सभी ने चुनौती के रूप में लिया. कोल्हान को नई पहचान दिलाने के लिए वे हर कोशिश करेंगी. महिलाओं ने उनका बहुत साथ दिया है. इसलिए वे महिलाओं का भी ध्यान रखेंगी. रोजगार , शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई काम करने की योजना है''. 

पिछले साल दिसंबर महीने में कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही झारखंड की सियासत में अटकलें तेज होने लगी थी कि इस बार चाईबासा में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ेगी. तमाम समीकरणों और सवालों के बीच पूछा जा सकता है कि झारखंड में विपक्षी दलों के तमाम दिग्गजों की हार के बीच गीता ने बीजेपी के एक शीर्ष नेता को कैसे मात दी. 

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गीता कोड़ा की इस ताकत के पीछे खड़े हैं उनके पति पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा. कोल्हान की इस बार गीता कोड़ा की जीत के लिए मधु कोड़ा ने दिन रात की मेहनत की. पुराने सारे समीकरणों को जोड़ते रहे. 

दरअसल मधु कोड़ा कोल्हान की राजनीति में खुद को जमीनी नेता के तौर पर स्थापित की है. 2000 और 2005 में मधु कोड़ा चाईबासा के जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से जीते थे. 2005 में बीजेपी ने उनका टिकट काटा, तो वे निर्दलीय जीते. इसके बाद 2006 में भाजपा की सरकार का तख्ता पलटते हुए विपक्षी दलों के समर्थन से सत्ता का बागडोर संभाली. जाहिर है निर्दलीय विधायक रहते हुए सीएम बनने का रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज है. 

हालांकि बाद में भ्रष्टाचार और मनी लाउंड्रिंग के मामले में फंसने से मधु कोड़ा के बड़े सेटबैक का सामना करना पड़ा. फिलहाल वे चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराए गए हैं. लेकिन कोल्हान की राजनीति में आरोपों से उनकी जमीन पर असर नहीं पड़ा है. 2014 और 2019 के परिणाम इसके संकेत हैं. 

एक अहम बात यह रही है कि चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान बीजेपी कोड़ा पर लगे आरोपों को उछालती रही है, लेकिन मधु कोड़ा और गीता कोड़ा मुंह कभी नहीं लगाते. या कोई तल्ख टिप्पणी नहीं करते. आदिवासियों के बीच इससे उन्हें लाभ मिलता रहा है. 

बंदगांव इलाके के एक आदिवासी युवा निरल सांगा कहते हैं कि गीता कोड़ा मुद्दे और सवालों पर बात करती हैं और आदिवासियों के बीच बहुत सहज, सरल ढंग से आती जाती रही हैं. गीता कोड़ा की पहुंच दूरदराज के इलाकों में आदिवासी महिलाओं के बीच ज्यादा रही है.  

इससे पहले 2009 में मधु कोड़ा ने चाईबासा संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़कर राष्ट्रीय दलों को अहसास करा दिया था कि उनकी पैठ सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र में ही नहीं है. जब वे सांसद बने, तो जगरन्नाथ विधानसभा क्षेत्र से गीता कोड़ा विधायक का चुनाव जीतीं. इसके बाद 2014 में भी गीता ने विधानसभा का चुनाव जीता. जाहिर है कोड़ा दंपती ने कोल्हान में  प्रभावकारी जमीन तैयार की है. साथ ही कार्यकर्ताओं की फौज भी खड़ी की है.

चुनावी प्रबंधन में भी कोड़ा दंपती माहिर माने जाते हैं और वक्त रहते पने धुर विरोधियों को भी साध लेते हैं. वरना बीजेपी की लहर में लक्ष्मण गिलुआ जैसे कद्दावर नेता को रोकना आसान नहीं था. 

समीकरण

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क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए मधु कोड़ा और गीता कोड़ा ने कांग्रेस का दामन थामा. पिछले साल उनकी जयभारत समानता पार्टी के कांग्रेस में विलय के बाद कोड़ा दंपती ने सबसे पहले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को लामबंद करना शुरू किया. 

चाईबासा के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयनम कहते हैं कि मधु कोड़ा और गीता कोड़ा बहुत पहले से चुनावी तैयारी में जुटे थे. और गांव- गांव जा रहे थे. इसका सीधा लाभ गीता कोड़ा को मिलता दिख रहा है. साथ ही कोल्हान के आदिवासियों के बीच कोड़ा दंपती की खासी पैठ रही है. इस बार भी मधु कोड़ा चुनाव की मुहिम संभाले रहे. जबकि गीता कोड़ा भी कोल्हान इलाके के गांव- गांव लगातार जाती रहीं. सुदूर इलाकों में आदिवासी महिलाओं के बीच उनकी पहुंच ने बीजेपी की परेशानी बढ़ाई. 

गीता कोड़ा ने आदिवासी सवालों को चुनाव के दौरान खूब उठाया. साथ ही आदिवासियों को अहसास कराया कि सांसद उसे बनाएं जो दिन रात, सुख दुख में आपके साथ रहता हो. महिलाओं और आदिवासियों को गीता कोड़ा का यह नुस्खा भाने लगा. गीता कोड़ा की सहज, सरल जनप्रतिनिधि की छवि रही है. साथ ही विपक्ष का साझा उम्मीदवार होने का भी उन्हें लाभ मिला है. कोड़ा दंपती जेएमएम के जमीनी कार्यकर्ताओं को पूरे चुनाव के दौरान तवज्जो देते रहे. बीजेपी के हर दांव पर कोड़ा दंपती की पैनी नजर रही और समय रहते वे उसे तोड़ने में जुटे रहे.  

इधर चुनाव के दौरान लक्ष्मण गिलुआ और बीजेपी की परेशानी इन्हीं बातों को लेकर रही कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की शिकायत थी कि एक सांसद के तौर पर उन्होंने क्षेत्र को कम वक्त दिया. और रांची, दिल्ली की राजनीति में रमे रहे.

गिलुआ की राह आसान हो, इसी मकसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा भी चाईबासा में हुई. मुख्यमंत्री रघुवर दास कई दिन प्रचार मे जुटे रहे. लेकिन लक्ष्मण गिलुआ की चुनावी नैया पार नहीं हो सकी.  

जबकि सात मई को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की चाईबासी में चुनावी सभा ने गीता कोड़ा के लिए कारगर साबित हुई. जेएमएम के हेमंत सोरेन का दौरा भी काम आया. 

सरायकेला 

चाईबासा संसदीय क्षेत्र के छह विधानसभा क्षेत्रों में पांच पर जेएमएम का कब्जा है. पिछले चुनाव में गिलुआ ने  लक्ष्मण गिलुआ ने सरायकेला विधानसभा सीट से ही लगभग 80 हजार वोटों की बढ़त ली थी. इस बार गीता कोड़ा इस बात को लेकर फिक्रमंद रही कि सरायकेला में बीजपी की लहर धीमी की जाए. और हद तक वे सफल रहीं. सरायकेला के अलावा चाईबासा और चक्रधपुर में भी बीजेपी का जलवा बहुत असरदार नहीं रहा. जेएमएम के वरिष्ठ नेता और चाईबासा नगर पर्षद के अध्यक्ष मुन्नू ठाकुर ने गीता कोड़ा के लिए मोर्चा संभाला, तो उन्हें दम मिलता चला गया. हालांकि शुरुआती दिनों में झामुमो के विधायकों की नाराजगी और दूरियां से गीता कोड़ा परेशान जरूर रहीं. लेकिन समय रहते कोड़ी दंपती ने नाराजगी को भी थाम लिया. 


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