झारखंड आंदोलनकारी और सोशल एक्टिविस्ट बशीर अहमद नहीं रहे, शोक की लहर

झारखंड आंदोलनकारी और सोशल एक्टिविस्ट बशीर अहमद नहीं रहे, शोक की लहर
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पीबी ब्यूरो ,   Aug 08, 2020

झारखंड आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले और सामाजिक कार्यकर्ता  बशीर अहमद का आज रांची में निधन हो गया है. उनके निधन की खबर से शोक की लहर है.

उन्हें जानने वाले कई लोग रांची स्थित उनके हिंदपीढ़ी आवास पहुंचे हैं. बशीर अहमद मूल तौर पर सिमडेगा में बानो के रहने वाले थे. लेकिन रांची में उनका दिल रच बस गया. 

बशीर अहमद लगभग 60 साल के थे. सहज, सरल, व्यवहार कुशल और सामाजिक समरसता के पैरोकार होने के चलते वे लोकप्रिय थे. 

झारखंड के विषयों, जन सवालों और मुद्दे पर उनकी अच्छी पकड़ थी. वे अखबारों में लेख लिखते और कार्टून बनाने के भी शौकीन थे. 

लिहाजा राजनीतिक, सामाजिक और पत्रकारिता जगत के लोगों से भी उनके नजदीकी रिश्ते रहे. 'बशीर भाई' के नाम से उन्हें जाना- पुकारा जाता था. 

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बशीर अहमद के परिजन चांद भाई ने बताया कि सुबह में उन्होंने हरारत महसूस की.

उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन दिल का दौरा पड़ने से वे हम सभी को छोड़ गए.

इससे पहले उनकी तबीयत नासाज थी. वे अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे.

इसके बाद उनकी इको और कोरोना की जांच कराई गई थी. लेकिन दोनों रिपोर्ट ठीक थी. जांच के  बाद घर के लोग भी इत्मिनान थे. लेकिन अचानक यह सब हो गया. 

चांद भाई ने बताया कि बंशी चौक हिंदपीढ़ी से उनका जनाजा निकलेगा. रातू रोड स्थित कब्रिस्तान में उन्हें मिट्टी दी जाएगी. 

सामाजिक कार्यकर्ता और माले के सदस्य नदीम खान ने बताया कि कुछ साल पहले बशीर भाई की हर्ट की सर्जरी हुई थी. लेकिन वे हमेशा खुशमिजाज और संयमित रहे. लगातार सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन में भाग लेते रहे. यकीन नहीं हो रहा कि अब वे हमारे बीच नहीं रहे. हमारा एक सच्चा और अनुभवी गार्जियन चला गया. 

इस बीच अलोका कुजुर ने जानकारी दी है कि शाम में पांच बजे एक शोक सभा की जाएगी. 

इधर वरिष्ठ पत्रकार दीपक अंबष्ठ और शंभुनाथ चौधरी ने भी बशीर अहमद के निधन पर शोक जाहिर किया है. दीपक अंबष्ठ ने कहा है, एक शानदार इंसान हमारे बीच नहीं रहे. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिवार को दुख सहने की हिम्मत. 

शंभुनाथ चौधरी ने फेसबुक वाल पर उनके कई कार्टून शेयर करते हुए लिखा है, ''आपके चुभते हुए कार्टून और रेखाचित्र बहुत याद आयेंगे. अलविदा बशीर भैया. सादर नमन.''

उधर भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने भी शोक जताया है. इसके साथ ही बशीर अहमद के तीन कार्टून को अपने वाल पर शेयर किया है. 

सामाजिक कार्यकर्ता और झारखंड संदेश के संपादक अशोक वर्मा ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है,''अलविदा कॉमरेड बशीर अहमद. ऐसे भी कोई अचानक जाता है?  हम सभी दोस्तों को रोता-बिलखता छोड़ चल दिए. जैसे हमसे कोई मतलब ही नहीं था. बशीर भाई यानी एक हरफनमौला शख्सियत. लड़ाकू झारखंड आंदोलनकारी, हर मौके पर हाजिर सोशल एक्टिविस्ट, पत्रकार, कार्टूनिस्ट, हर दिल अजीज. उफ़...अलविदा बशीर अहमद.''  

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झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करने वाले आजसू के पूर्व उपाध्यक्ष और बीजेपी के पूर्व प्रवक्ता प्रवीण प्रभाकर बताते हैं कि आंदोलन के दौरान बशीर अहमद ने बतौर संस्कृतिकर्मी जो अलख जगाई वो भूला नहीं जा सकता. उस दौर में मुश्किलें तमाम आतीं, पर कभी उन्हें घबराते नहीं देखा. उनके निधन की खबर से मर्माहत हूं. 

इस बीच आजसू के केंद्रीय उपाध्यक्ष और झारखंड आंदोलन के भागीदार हसन अंसारी ने दुख जाहिर करते हुए कहा कि राज्य ने एक विचारक, संस्कृतिकर्मी और जमीन से जुड़कर संघर्ष करने वाले इंसान को खो दिया है.हसन बताते हैं कि बशीर भाई दूसरे को सुनने-समझने पर विश्वास रखते. और कठिन वक्त भी हंस कर निकाल देते.

बशीर अहमद के साथ आंदोलन के दौरान गुजारे वक्त हम कभी भूल नहीं पाएंगे. 

सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने शोक प्रकट करते हुए कहा है, ''बशीर भाई हर आंदोलन और संघर्ष में मेरी हिम्मत बढ़ाते. लॉकडाउन के दौरान जब हमने अपनी चाय की दुकान खोली, तो वे कई बार आए. मौजूदा हालात पर विचार साझा किए. अब वे हमारे बीच नहीं रहे. बशीर भाई को अंतिम जोहार''. 

वरिष्ठ पत्रकार शहरोज कमर ने लिखा है, ''उनके हर दुख-सुख के सहभागी रहे भाई नदीम से सुबह मिली इस सूचना से दुख हुआ. जन मुद्दे से जुड़े कई मोर्चे पर बशीर भाई की शिरकत होती रही और हम उन्हें इसी नाते जानते रहे. एकाध बार उनकी अख़बारी ज़िंदगी का भी पुराना पता मिला, लेकिन मार्च महीने की एक शाम उनके कार्टून और जल तरंग की उनकी पुख़्ता चुहल ने तो हैरान कर दिया. ऐसी एक्यूरेसी नहीं देखी. उनसे जब मिलते, तब हम ज़िद करते, कार्टून जारी रखिये. उनकी वही सक्रियता देख हम सभी अर्श-हर्ष करते. अब तो सिर्फ गर्द है और ग़ुबार है.''  

जनजातीय विभाग की शिक्षिका आलम परसा ने लिखा है, ''या अल्लाह ये क्या हो गया..अभी अभी खबर मिल रही है जिस पर यक़ीन नही हो रहा. हम अपनी दुनिया में मगन, रहे और उन्हें खो बैठे''  

साहित्यकार और लेखक महादेव टोप्पो ने कहा है, एक जिंदादिन इंसान और दोस्त का विदा होना बेहद दुखद. बशीर अहमद सृजनशील थे. 


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