स्थानीयता को लेकर खतियान के चक्कर में ही कुर्सी गंवा चुके हैं बाबूलाल मरांडीः निशिकांत दुबे

स्थानीयता को लेकर खतियान के चक्कर में ही कुर्सी गंवा चुके हैं बाबूलाल मरांडीः निशिकांत दुबे
पीबी ब्यूरो ,   Jan 15, 2020

झारखंड में गोड्डा से बीजेपी के सांसद निशिकांत दूबे ने स्थानीय नीति को लेकर जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन के बयान पर अहम टिप्पणी की है. इसके साथ ही उन्होंने नई सरकार को आगाह कराया है और कांग्रेस पर सीधे तौर पर निशाना साधा है. उन्होंने यह भी कहा है कि इसी खतियान के चक्कर में भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कुर्सी गंवा चुके हैं. 

निशिकांत दुबे ने अपने फेसबुक वाल पर यह टिप्पणी की है. साथ ही ट्वीट किया है.

शिबू सोरेन के बयान को लेकर संभावित मुश्किलों की भी चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है, ''झारखंड में 30 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं, जिनके पास घर का न ही जमीन का खतिहान है. पिछले साल ही पौडैयाहाट में सरकार 25 आदिवासियों का मकान जो सरकारी ज़मीन पर बना था तोड़ चुकी है, गरीब आदिवासियों की सरकार उनको बंगलादेश या पाकिस्तान भेजने की तैयारी कर रही है''?

बीजेपी सांसद ने कहा है, ''इस राज्य का बंटवारा 1905 में ईस्ट बंगाल और वेस्ट बंगाल के तौर पर 1912 में वेस्ट बंगाल और बिहार के तौर पर, 1936 में बिहार और उड़ीसा के तौर पर तथा 2000 में बिहार व झारखंड के तौर पर हुआ है. कल मान लिया जाए कि छोटानागपुर और संथालपरगना का बंटवारा होता है तो खुद गुरुजी (शिबू सोरेन) छोटानागपुर राज्य के होंगे या संथालपरगना के.

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बीजेपी सांसद ने यह भी कहा कि इसी खतियान के चक्कर में भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी जी कुर्सी गँवा चुकें हैं. झारखंड हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में इसे असंवैधानिक घोषित किया है. लेकिन यह तो कांग्रेस है. इसका (कांग्रेस का) संविधान से क्या लेना देना?

गौरतलब है कि मंगलवार को रांची से दुमका जाने के दौरान धनबाद के बरवाअड्डा में पत्रकारों से जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन ने कहा है कि झारखंड सरकार मौजूदा स्थानीय नीति में संशोधन करेगी. यह पार्टी का जनता के समक्ष किया गया वादा है. झारखंड में 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाई जाएगी. 

जेएमएम ने चुनावी घोषणा पत्र में भी कहा है कि स्थानीय नीति में संशोधन किया जाएगा.

1932 का फार्मूला यही है कि जिनके पास अपने या पूर्वजों के नाम अंतिम सर्वे रिकॉर्ड में जमीन होगी उन्हें ही स्थानीय के दायरे में शामिल किया जाएगा.

जबकि रघुवर दास की सरकार ने तय किया है कि 1985 से झारखंड में रहने वाले झारखंडी माने जाएंगे. 

 तमाम सवालों और विवादों के बीच रघुवर दास सरकार के नाम ही रिकॉर्ड है कि उसने राज्य में स्थानीय नीति बनाई. 


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