'बेबसी की इंतिहा उस मजदूर से पूछिए, जो पेट पर कपड़ा बांधे चला जा रहा'

'बेबसी की इंतिहा उस मजदूर से पूछिए, जो पेट पर कपड़ा बांधे चला जा रहा'
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पीबी ब्यूरो ,   May 14, 2020

गरीब हैं और मजबूर भी. मजदूरों का  यही नसीब है. जब कोई आसरा नहीं मिला, तो घर की ओर चल पड़े. अब चाहे कितने दिन लगे, बस एक ही तड़प है गांव पहुंच जाएं. लॉकडाउन के चलते काम-धाम बंद क्या हुए पेट की चिंता में देह ढीला पड़ने लगा. सामने बीवी- बच्चों का हताश-निरश चेहरा. आखिर क्या करते. एक ही रास्ता था कि गांव चलो और फिर शुरू हो गया सफर.

ईट भट्टे में काम करने वाले मजदूर मनोज, सोनिया, सुरेन्द्र जब यह सब कह रहे होते हैं, तो उनके परिवार के लोग हां- में हां मिलाते हैं.

ठेला के पीछे ठेला और सब पर लदे औरतें, मोटरी-गठरी और बाल बुतरू. 

झारखंड में साहिबंगज के शर्मापुर- महराजपुर मुख्य सडक मार्ग पर यह नजारा आम है.

यह इलाका बंगाल और बिहार से सटा है. लिहाजा कोई बंगाल जाने के लिए तरस रहा है, तो कोई बिहार वापस होना चाहता है. झारखंड के प्रवासी मजदूरों की कमोबेश यही हालत है. वे बंगाल से लौटने के लिए परेशान हाल हैं. 

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सैकड़ों मजदूरों का बाल- बच्चों के साथ इसी तरह आना- जाना जारी है. सडक मार्ग पर दौड़ते-भागते ये मजदूर अलग-अलग अंदाज में जाते दिखाई देते हैं। 

परिवार के सदस्य बारी बारी से ठेले के धक्का लगाते हुए सफर कर रहे हैं. बहुतों को पता नहीं कि सरकार ने उनके गांव लौटने के लिए बसों की व्यवस्था की है. बच्चे भूख-प्यास से व्याकुल दिखाई दिए तो कुछ लोगों ने नमकीन, बिस्कुट दिलाए. 

मनोज बताते हैं ''रास्ते में कहीं किसी ने खाना खिला दिया, तो जी भर का दुला सलाम करते हैं. बहुतेरे मजदूरों को ठेकेदारों से उम्मीद थी कि रोजगार फिर से शुरू होगा, लेकिन सभी संभावनाओं पर जैसे विराम सा लगा हुआ है. इसके चलते अब फैक्ट्रियों, निर्माण कार्यों में बैठे मजदूर घरों की ओर रुख करने लगे हैं''.

सोनिया बताते हैं कि जिन ठेले पर ईट ढोते थे वह अब परिवार का सहारा बना है. सड़कों पर कोई साईकिल तो कोई पैदल चले जा रहा है. यह कोरोना वायरस से भागने वाली भीड़ नहीं है बल्कि मजबूरियों की भीड़ है. हमारे पास खाने के पैसे नहीं हैं. अपने गांव जाएंगे तो कम से कम गुजारा चला लेंगे.

लॉकडाउन के बाद पास में रखे पैसे खत्म हो गए. काम बंद है. परदेस में घर का किराया कैसे देंते और पेट कैसे पालते. यही वजह है कि बंगाल से करीब 500 किलोमीटर दूर झारखंड के रास्ते बिहार और इससे भी आगे जाने के लिए ठेले पर निकल पड़े हैं. 


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