कल कौन सा पिटारा खोलेंगे अखिलेश और मायावती?

कल कौन सा पिटारा खोलेंगे अखिलेश और मायावती?
Uttarpradesh.org
पीबी ब्यूरो ,   Jan 11, 2019

लखनऊः उत्तरप्रदेश से निकली एक राजनीतिक खबर पर देश की नजरें टिकी है. 11 जनवरी को समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी की प्रमुख मायवाती साझा प्रेस कांफ्रेस करेंगे. मायावती और अखिलेश की यह पहल इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 

साथ ही कयास लगाए जा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से दोनों दलों के बीच साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिशों पर दोनों नेता मुहर लगाने जा रहे हैं.  

सपा के सचिव राजेंद्र चौधरी और बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने साझा बयान जारी कर बताया है कि 11 जनवरी को दिन के बारह बजे अखिलेश यादव और मायावती एक साथ मीडिया से मुखातिब होंगे. 

हाल ही में उत्तरप्रदेश में कथित तौर पर खनन घोटाले में नाम आने पर अखिलेश यादव ने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा भी था कि समाजवादी पार्टी लोकसभा की अधिक सीटें जीतना चाहती है. इसके लिए पार्टियां गठबंधन करेगी. चुनाव लड़ेगी और जनता वोट डालेगी. बीजेपी और उसकी सरकारें अपने विरोधियों को डराने की कोशिशें करती रहे. 

क्या होगा कांग्रेस का

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 आगे साझा तौर पर दोनोंं दलों के नेताओं के सामने आने की खबर के साथ ही अटकलें तेज हैं कि लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा के बीच गठबंधन की तस्वीर साफ की जा सकती है. 

इनके अलावा किस दल के हिस्से कितनी सीटें होंगी इसकी भी घोषणा की जा सकती है. फिलहाल राजनीतिक गलियारे में इसकी चर्चा है कि दोनों दलों ने 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति बनाई है. हालांकि इसका खुलासा बाकी है. 

अखिलेश यादव और मायावती के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने की इस तैयारी में कांग्रेस के प्रति दोनों दलों का रुख क्या होगा इसे भी देखा जा सकता है. 

हाल के दिनों में अखिलेश यादव और मायावती ने कई मौके पर यह जतलाने की कोशिशें की है कि वे कांग्रेस अथवा प्रस्तावित किसी महागठबंधन के साथ चलने के लिए तैयार नहीं हैं. पिछले दिनों गठबंधन को लेकर विपक्षी दलों की बैठक से भी अखिलेश यादव ने दूरी बनाए रखी थी. 

छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में भी सपा और बसपा के प्रमुख शामिल नहीं हुए थे.

जबकि पिछले साल मई मनहीने में कर्नाटक में एचडी कुमार स्वामी के शपथ ग्रण समारोह में पहली बार मायावती और अखिलेश यादव ने मंच साझा किया था. और इसके बाद से दोनों नेता उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति में बीजेपी को रोकने के लिए साथ कदम बढ़ाते चले गए. 

वैसे मीडिया रिपोर्टस में इसके संकेत उभर रहे हैं कि उत्तरप्रदेश में रायबरेली और अमेठी की सीट कांग्रेस के लिए जबकि बाकी चार सीटें छोटे दलों के लिए छोड़ी जा सकती है. जाहिर है कांग्रेस उत्तरप्रदेश में कोई नया समीकरण तलाशना चााहेगी या अकेले लड़ेगी. 

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कब बढ़े साथ 

लोकसभा में समाजवादी पार्टी के अभी सात सासंद हैं और उत्तरप्रदेश विधानसभा में सपा के 48 विधायक हैं. जबकि बसपा के 19 विधायक हैं और राज्यसभा में चार सांसद.

 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यहां अकेले 39.6 फ्सदी वोट मिले थे, तो सपा और बसपा को 22 फीसदी. इससे पहले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 42.6 फीसदी वोट मिले थे, और सपा बसपा को 42 फीसदी. 

जाहिर तौर पर सपा ज्यादा मजबूत है. इसलिए ये सवाल भी उठने लगे हैं कि सपा- बसपा गठबंधन में नेतृत्व कौन करेगा या फिर कौन किसके लिए अहम से समझौता करेगा.  

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दरअसल उत्तरप्रदेश में पहले लोकसभा और फिर विधानसभा के चुनाव में बीजेपी की जोरदार जीत के बाद से ही सपा- बसपा के नेता यह समझने लगे थे कि एक प्लेटफॉर्म पर साथ चले बिना टिकना मुश्किल हो सकता है.  

इसके साथ ही बुआ- बबुआ की राजनीतिक लड़ाई भी आपसी मेलजोल में बदलती चली गई. कई मौके पर दोनो दलों के नेताओं ने साथ में कार्यक्रम भी किए. बीजेपी सरकार के खिलाफ हमला भी बोला. 

हाल ही में सपा और बसपा के नेताओं ने साझा तौर पर प्रेस कांफ्रेस कर कथित तौर पर खनन घोटाले मे अखिलेश यादव का नाम के आने पर बीजेपी की सरकार पर निशाना साधा था. 


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